2122 2122 2122 2122, दोहे


शालिनी शर्मा की कविता

लीजिये दोस्तों फिर हाजिर हूँ अपनी नयी रचनाओं के साथ,नया साल आप सभी को हर्ष,उल्लास,वैभव दे
आपकी सभी मनोकामना पूर्ण हों


दोहे

 आरी से काटा गिरा,हरा भरा वो पेड़ |
लाश वृक्ष की कह रही,मत विनाश को छेड़ ||
                     शालिनी शर्मा



उस माँ से पूछो जरा,जाकर उसका हाल |
बिना खता के भीड़ ने,छीना जिसका लाल ||


चिन्ता का कारण बनी,आसमान की धुंध |
वन उद्योगो के लिए,काटे अंधाधुंध ||
                       शालिनी शर्मा


हिप्नोटाइज कर दिया,और मति दी फेर |
उनके कहने पर लिली,दिखने लगे कनेर ||
                   शालिनी शर्मा

चेहरे पे  चेहरा लगा,दो रंगा व्यवहार |
नये साल में वो हमें,नकली देगें प्यार ||


 नये वर्ष में हैं दुखी,पंछी, कोयल,काग |
किस ड़ाली पर बैठ कर,गायेगें हम राग ||
                        शालिनी शर्मा
नये साल में भूल कर,पिछली कड़वी बात |
चलो करें फिर स्नेह की,एक नयी शुरुआत ||
                     शालिनी शर्मा



जिस धरती ने देखिए,पाला देकर अन्न |
हम उस के विध्वंस पर,कितने हुए प्रसन्न ||

                     
प्रेम और सद्भाव ही,जिसका है सन्देश |
क्यूं नफरत की आग से,जला रहे हो देश ||
                        शालिनी शर्मा

दोहे
स्वस्थ रहे भारत सदा,हो हर घर खुशहाल |
हरी सब्ज़ियां खाइये,खायें रोटी दाल ||

मच्छर से बचकर रहें,ये करते बीमार |
गन्दे घर में रोग की,रहती है भरमार ||

योग और व्यायाम से,स्वस्थ रहे इन्सान |
रोज सुबह उठकर करो,सबसे पहले स्नान ||

साफ करो उठ कर सुबह,तुम अपने ये दाँत |
पानी पीने से सुबह,स्वस्थ रहेंगी आँत ||
  
गन्दे दांतो में रहे,कीटाणु का वास |
मुंह में हो बदबू अगर,कोई न आता पास ||

कीड़ा दांतो में लगे,दर्द रहे दिन रात |
हमें माननी चाहिए,ब्रश करने की बात ||

करो सुबह को सैर सब,और करो सब योग |
अच्छी आदत सीखिए,करें हँसी उपयोग ||

साफ सफाई हो जहाँ,वहाँ दूर हो  रोग |
स्वास्थ्य क्रान्ति के लिए,जुट जायें सब लोग ||

 देश बचाने के लिए,कुछ तो करो विचार |
कानूनो में कीजिए,सख्ती और सुधार |
                         
आने वाली नस्ल ये,कैसे रहे निरोग |
जब वायु में भर रहे,विष वाहन,उद्योग ||

पावन नदिया रो रही,जब से बनी कुरूप |
अपशिष्टो से सड़ गया,पावन जल का रूप ||
                   शालिनी शर्मा




गीतिका
2122  2122  2122  2122 
सिर झुका के ही चलू मैं, यह जमाना चाहता है, 
क्यों उठा है सिर मेरा, सिर को झुकाना चाहता है।  

आज तक मैंने नहीं सौदा किया मजबूरियों का, 
वह मुझे मजबूर करके ही दबाना चाहता है। 

धन मुझे उसने दिया है इस तरह से फेंक,जैसे,
वो अना मेरी दबा, घुटनो पे लाना चाहता हैं।

जो दिया था फेंक कर, तूने, उसे ठुकरा दिया है,
दिल अभी भी ये अना, अपनी  बचाना चाहता है।

वो शिकारी है, नहीं आती दया उसको किसी पर,
फायदा मजबूरियों का,वो उठाना चाहता है।

आत्मा, संवेदना जिसकी यहाँ पर मर चुकी हो,
तू उसे इन आंसुओं को, क्यों दिखाना चाहता है। 

मौत पर मेरी उन्होंने, खूब हर्जाना दिया हैं, 
पुल गिरा क्यों, ये नहीं बस, वो बताना चाहता है। 
              
प्यार से तू देख ले, हम तो सदा को मर मिटेगें
कत्ल करके क्यों दगा से, तू मिटाना चाहता है।
                               शालिनी शर्मा 






किसी भी असमय होने वाली मौत पर दिल भर आता है सबको जीने का हक है चाहें वो जीव जन्तु हो या इन्सान 
कवि के पास सिर्फ कलम और शब्द होते हैं आक्रोश व्यक्त करने के लिए,क्यों सिर्फ नफरत ही नफरत भरी है लोगो में हर जिन्द
हर  जिन्दगी अनमोल  है
रूह काँप जाये ,ऐसी भयानक घटना उफ्फ

दोहे

कत्ल बांग्लादेश में,होते हैं अविराम |
कानूनो को तोड़कर,हिंसक हुई  अवाम ||

नयी नस्ल की सोच क्यों,विध्वंसक कर गोर |
देश पड़ोसी बढ़ चले,बरबादी  की ओर ||

साजिश है उस सोच की,जो जाहिल,गद्दार |
जो नफरत के बीज की,पोषक पालनहार ||
                     
भीड़ अराजक हो गई,और बढ़ा  उन्माद |
जला दिया फिर भीड़ ने,अफवाहों के बाद ||

आँख खोल कर देखिए,खतरनाक षडयन्त्र |
सिर तन से होगा जुदा,है जहरीला मन्त्र ||

कैसे इतनी क्रूरता,देता है ईमान |
भीड़ जला देती जहाँ,इक जीवित इन्सान ||

गूंज रही थी व्योम में,मानवता की चीख |
मांग रहा था जान की,जब वो दीपू भीख ||
 
भरे हुए औजार से,हर घर है तैयार |
हर काफिर से जन्म से,ही इनकी तकरार ||

हर हिन्दू को मार कर,चाहते हैं वो ताज |
अब भारत पर है नजर,करना चाहें राज ||

बन्द मदरसे कीजिए,पैदा करते  आग |
यहाँ जिहादी बन रहे,कहते यही सुराग ||
                      शालिनी शर्मा 



अगर चाहिए सुख,खुशी,दो सबको मुस्कान |
क्यों आपस में दुश्मनी ,क्यों सस्ती है जान ||

खाली हाथ आये यहाँ,जाना खाली हाथ |
धन,दौलत पद,शान तन,जायेगा न साथ

दीन दुखी के दुख हरो,ये देगें सम्मान |
रा ह गलत चुनकर कभी,मत बनना धनवान ||
                        शालिनी शर्मा

              
क्या न्यायालय भी यहाँ,सच के हुए ख़िलाफ़ |
निर्धन  किस  दर  जायेगा, पाने  को  इंसाफ||

क्या निर्धन को अब यहाँ,नहीं मिलेगा न्याय |
वो अर्जी देगा कहाँ ,कम हो जिसकी आय ||

यहाँ न्याय पर उठ रहे,अब तो खूब सवाल |
आम आदमी के लिए,सभी जगह हैं जाल ||

नेता,  अभिनेता  यहाँ, पहले  थे   बदनाम |
अब न्यायालय भी जुड़ा,जिस पर है इल्जाम ||

                         शालिनी शर्मा


                      
                2122 2122 2122 212 आधार छन्द गीतिका
क्या किया है जो छिपाना चाहते हैं वो यहाँ। 
किन सबूतों को मिटाना चाहते हैं वो यहाँ।।

वो नहीं है ठीक वैसे, लोग जैसा जानते। 
आइनो को क्यों हटाना चाहते हैं वो यहाँ।।

खूं किसी का कर दिया है,या किया कुछ तो गलत।
चींख कोई तो दबाना चाहते हैं वो यहाँ ।।

आ गये हैं घर में उनके,हाकिमों से भाग कर।
छिप-छिपा कुछ दिन बिताना चाहते हैं वो यहाँ।।

ये गवाही दे न पायें,जो अदालत जा रहे।
 रास्तों पर धन बिछाना चाहते हैं  वो यहाँ।। 
                       
दुश्मनी में है सभी जायज यहाँ, सच झूठ भी।
जो सबक हमको सिखाना  चाहते हैं वो यहाँ।।  

साजिशे भी झेलनी पड़ती, कभी इल्जाम भी।
झूठे केसो में फंसाना चाहते हैं वो यहाँ।।
                        शालिनी शर्मा




नेता इक दिन आपको, कर देगें खल्लास |
इन्हे एकता आपकी, कब आती है रास ||
                             शालिनी शर्मा 



 21 2  212   212  212
वक्त के   वार को आजमाते रहे,
सह गये हर सितम मुस्कुराते रहे। 

जिन्दगी ने जहर, जो दिया पी लिया,
हौंसलो से नया रण सजाते रहे।

जीत कर भी उन्हे हार ही तो मिली,  
देशवासी   उन्हे   जब  भुलाते रहे।

सोचिए जां शहीदो की कैसे गई 
जो अना के लिए जां गवाते रहे।

भूख से,प्यास से, वो तड़पते रहे,
गान फिर भी धरा का ही गाते रहे।
                       शालिनी शर्मा

कविता का बाजार ने,बना दिया उपहास |
पैसे  देकर मंच  ले ,और  सुना  बकवास ||


हक जीने का जो हरे,लेलो उसके प्राण |
मरने से बेहतर,सदा,रखो पास कृपाण ||
                        शालिनी शर्मा


मुझे सताया पल पल उसने,पर मैने प्रतिकार किया,
 हार कभी भी न मानी,न झुकना ही स्वीकार किया,
तोड़ सकोगे कैसे मुझको,फोलादी हैं लक्ष्य मेरे,
संघर्षों की अग्नि में जल जल कर पथ तैयार किया
                       शालिनी शर्मा

सबकुछ बिकता है यहाँ,इज्जत,अना,जुबान,

बस हर मानव की यहाँ, कीमत को पहचान ||

              जीवो पर दया करो
 आते हैं वो रात में, जेसीबी के साथ |
पूरा जंगल काटते,दिखे सैंकड़ो  हाथ  ||

तेज गति से रात में, मचा रहे कोहराम |
जंगल वासी भाग कर, कहें बचाओ धाम ||

कौन सुनेगा अब भला, जीवो की आवाज |
कितने संकटग्रस्त हैं, क्या कुछ है अंदाज ||

जीवो का दुख जान ले, मानव तू इक बार |
पीड़ा अपने मन जगा,फिर कर उनसे प्यार ||
                     शालिनी शर्मा

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