दोहे,मुक्तक







शालिनी शर्मा की कविता
  नमस्कार  दोस्तो 
                   आप मेरे दोहे , मुक्तक पढ़ते हैं ये मेरे लिए गर्व की बात है
                    लेखक का अपना कोई विचार नहीं होता जो वो समाज में
                    देखता है वही लिखता है,आपमें से कुछ इन विचारो से सहमत
                     हो सकते हैं और कुछ असहमत पर ये सच है कि जो भी लिखा
                     जा रहा है वो समाज में व्याप्त कुछ कुरीतियों पर है,कुछ विभेदकारी 
                      नीतियां जिन पर लिखा जाना जरूरी है
कुछ मानवता को शर्मसार करने वाली
घटनाएं,ऐसी घटनाएं जिन्हे एक स्वस्थ
दिमाग का व्यक्ति अंजाम नहीं दे सकता,कैसा लिखा है बताइये ग
 जरूर
मुझे पढ़ो जब भी कभी,करना सोच विचार |
जीवन का सच लिख दिया,मैने बारम्बार ||

मरना लगता है सरल,है जीना दुश्वार |
बेबस को लाचारियां,कैसे देती मार ||

रोजगार के बिन यहाँ,जीवन है अभिशाप |
जहर जिन्दगी का पियो,हरदिन बस चुपचाप ||
                 
निर्धनता को कोस कर,हो जाते निफ्राम |
पर उन्मूलन के लिए,करें न नेता काम ||
                     
पद पाते ही वो हुए,हमसे कितने दूर |
अहंकार इतना हुआ,दिखने लगा गुरूर ||


अहंकार में डूब के शासक मनमानी पर आया है, 
नियम लड़ाने वाला वो यूजीसी का लेकर आया है,
पग रोको मत पार करो हद सहनशीलता मत परखो, 
अहंकारियों  को जनता ने सदा सबक सिखलाया है ||



एपस्टीन फाइल कहे, मैं वो दस्तावेज |
जिसमें काले राज का,चश्मदीद हर पेज || 

पहने देखा भौर में,जिनको वस्त्र सफेद |
उनकी काली रात के,खुले घिनौने भेद ||
                    
मासूमों की देह पर,थे नरभक्षी दांत |
जश्न मना कर खा गये,मासूमों की आंत ||

मानवता रोती रही, देख सत्य की लाश |
नैतिकता तो मर गई,जिंदा हैं अय्याश ||

बड़े लोग ये देखिए, जिनके सिर हैं ताज |
 मुंह छुपाते फिर रहे,किस सच से ये आज ||
                  शालिनी शर्मा

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