शालिनी शर्मा की कविता
फागुन के इस माह में,बरसे रंग अबीर |
जिधर देखिए दिख रहे,नीले,लाल शरीर ||
साजन ने जब प्यार से,मुख पर मला गुलाल,
गोरा मुख स्पर्श से,हुआ शर्म से लाल
मानवता जलती दिखी,जलते दिखे मकान |
लालच की इस आग से,सदा जले इन्सान
जन्मदिवस पर दे रहे,दुआ आपको ढेर |
खुशियों के खिलते रहें,गेंदा,कमल कनेर ||
होली लेकर आ गयी,खुशियों की सौगात |
हर्ष और उल्लास से, रंग कर रहे बात ||
शालिनी शर्मा
हम रंगो की होली खेल रहे हैं जब कि ईरान,इजराइल अमेरिका खून की होली
खेल रहे हैं
आसमान बरसा रहा,जिन लोगो पर आग |
कितने घर के बुझ गये,मालुम नहीं चिराग ||
हासिल क्या है युद्ध से,लाता युद्ध विनाश |
एक मिनट में जिन्दगी,बन जाती है लाश ||
द्वेष,कपट,छल के बिना,गाते बच्चे फाग |
बड़े लोग ही बैर की,बरसाते हैं आग ||
शालिनी शर्मा
गीतिका
चाबी से मानव चलता है मानव एक खिलोना है
भाग्य विधाता ने जो लिखा,वही नियति में होना हैं
क्या खोया है क्या पाया है,साथ न कुछ भी जायेगा
मिला नही या गंवा दिया है, ये बेकार का रोना है
वही सुखी है सबसे ज्यादा ,सुख से जो सो लेता है
बेफिक्री की नींद से बढ़कर ,यहां न चांदी सोना है
यहां लोग ऐसे भी जीते,जिन्हे न रोटी मिलती है
आसमान , धरती ही जिनका,चादर और बिछोना है
यहाँ आसुंओ की कीमत को,कोई नही समझता है
जहाँ किसी को दर्द दिखाये यहाँ न ऐसा कोना है
शालिनी शर्मा






Comments