शालिनी शर्मा की कविता
दोहे
मन्जिल
ठोकर खाकर भी उठा,हार न थी मंजूर |
तेज भाग कर मिल गयी ,मंजिल जो थी दूर ||
एक पैर जब कट गया,हुआ न वो कमजोर |
एक पैर से भी चला,वो मंजिल की ओर ||
मन्जिल उसको ही मिली,जिसको इसकी चाह |
जिसने बाधा,शूल की ,कभी न की परवाह ||
लक्ष्य भेदने के लिए,हासिल कर तरकीब |
कर प्रयास कुछ और,है,मंजिल बहुत करीब ||
शालिनी शर्मा

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