शालिनी शर्मा की कविता
सभी समस्या का यहाँ,केवल एक निदान |
आबादी विस्फोट का,समझो तुम नुकसान ||
पथ विकास का रोकते,जनसंख्या के शूल |
आबादी विस्तार है,बेहद घातक भूल ||
सही से न शिक्षा मिले,न भोजन आवास ,
बस अभाव में जिन्दगी,बन जाती परिहास ||
बच्चे दो ही ठीक हैं,इस पर करो यकीन |
सोचो दस बच्चे जहाँ,क्या होता है सीन ||
कभी कृषि था देश का,एक प्रमुख व्यवसाय |
हो जाती थी हर जगह,सबकी अच्छी आय |
अपनी भूमि बेचकर,हो गये हम कंगाल |
हमें दिखावे की लगी,ऐसी झूठी हाय ||
तू इसको खा नोच के,मैं इसको लूं नोच |
संसाधन को नोच लो,यही रही है सोच ||
जनता ने खुद से किया,अपना सबकुछ नाश |
हमें जरूरत बना रही,चलती फिरती लाश ||
तू इसको खा नोच के,मैं इसको लूं नोच |
संसाधन को नोच लो,यही रही है सोच ||
अभिलाशायें कम करो,साफ करो आकाश |
आने वाली नस्ल को,मिलता रहे प्रकाश ||
अपनी भूमि बेच कर,बन गये हम मजदूर |
बड़ी कम्पनी कर रही,मरने को मजबूर ||
सुख की पूंजी छोड़ कर,अपना लिया कलेश |
बेवकूफ जन सोचते,है विकास पर देश ||
ये नेता जब चल बसे,लेकर कर्ज उधार |
कहेगीं इनकी आत्मा,जाकर कर्ज उतार ||
शालिनी शर्मा





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