दोहे

शालिनी शर्मा की कविताओं






चिड़िया आकर कह रही,गर्मी है घनघोर |
शहरो में पानी नहीं, खोज लिया हर ओर ||
                       शालिनी शर्मा 


 सादर समीक्षार्थ प्रेषित 
वृक्षों   की  उपयोगिता, जब-जब  भूले  लोग |
कुदरत से खिलवाड़ का, महंगा पड़ा प्रयोग ||

चींख चींख कर कह रहे,गर्मी के हालात |
बिना वृक्ष के किस तरह, आएगी बरसात ||
                       शालिनी शर्मा



 किसी पार्टी के कभी,बनना नहीं गुलाम,
इन्हे आपके वोट से,है बस केवल काम ||



यहाँ कीमती क्यों भला,बस नेता की जान |
दुश्मन तेरी जान का,कौन यहाँ पहचान ||
 
भूमि जिसने बेच दी,हुआ वही कंगाल |
सदा रहो मजदूर तुम,ये है उनकी चाल ||

ये विकास के नाम पर,छीन रहे अधिकार |
धूल झोंक कर आँख में,दें मृत्यु उपहार ||

ढ़ोगीं,झूठे मतलबी,करें मौत व्यापार |
बेच देश को कर दिया,कर्जे से श्रृंगार ||
                शालिनी शर्मा 
                                 

                      


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