शालिनी शर्मा की कविता
लखनऊ के अलीगंज के अग्निकांड पर क्रोध और दुख की अभिव्यक्ति
दोहे
शोक मना के कर दिया,पूरा अपना फर्ज।
बच्चे जो जलकर मरे,चढ़ा गये हैं कर्ज।।
कितनी सस्ती हो गई,अब बच्चों की जान।
भृष्टाचारी तन्त्र के,मिलते नहीं निशान।।
क्यों अवैध निर्माण को,कर देते मन्जूर।
साहब को किस बात का,वेतन दिया हुजूर।।
सही तरीके से नहीं,करता सिस्टम काम।
नियम तोड़ कर बस उन्हे,अच्छे दे दो दाम।।
आगजनी पर था नहीं,कोई वहाँ निकास।
इसीलिए बच्चे बने,क्रूर काल के ग्रास।।
अधिकारी करने लगे,अब हत्या का काम।
है जघन्य अपराध ये,त्रुटि का मत दो नाम।।
शालिनी शर्मा
पिता
चाहें राजा हो पिता,चाहें हो मजदूर।
बच्चों के संकट सभी,करते पालक दूर।।
बच्चों का पालन करे,अपनी ख्वाहिश मार।
पालन पोषण के लिये,लेते कभी उधार।
खुद चिन्ता में डूबकर,सुखी करें परिवार।।
कड़ी धूप में भी करें,काम,बिना विश्राम।
जिससे बच्चों को मिले,घर में सब आराम।।
पिता भवन की नींव हैं,और वही दीवार।
छत जैसे होते पिता,होते पहरेदार।।
पिता को लगता न कभी,काम कोई दुश्वार।।
हर बाधा से तात ही,करवाते हैं पार।।
बच्चों को हर सुख मिलें,करते पिता प्रयास।
महनत कर कर के करें,पूरी उनकी आस।।
शालिनी शर्मा
खेत
खेत हमें कब याद हैं, और याद कब बाग़।
बर्गर,पिज्जा याद हैं,भूल गये हैं साग।।
बच्चों को नकली दिशा,दिखा रहा परिवेश।
खेत बेच कर भेजते,अपने वत्स विदेश।।
सड़कों के इन जाल से,हुए खेत बर्बाद।
जंगल ये कंक्रीट के,कौन सुने फरियाद।।
वो मालिक है गाँव में,जिसके पास जमीन।
खेत बेच हलधर हुआ,दूजे के आधीन
शालिनी शर्मा




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