दोहे

शालिनी शर्मा की कविता


असली नकली की जरा,करो आप पहचान।
पेड़ यहाँ हैं कीमती,या मशीन,सामान

संसाधन सब बेच कर,खड़े हैं खाली हाथ।
नौकर बनने की प्रथा,खुद लिख ली है माथ।।

जीने दो और खुद जियो,यही अमिट है बात।
रिश्ता पंछी फूल का,यहाँ सभी को ज्ञात।।

प्यार करो हर जीव से, इनमें हैं जज़्बात।।
इस धरती पर जीव हैं,कुदरत की सौगात।।

बड़ी मछलियों को करो,काबू में सरकार।
छोटी मछली मार दी,नियम सभी बीमार।।

मौत सामने है खड़ी,मत डालो हथियार।
सिस्टम को क्या है कभी,यहाँ आपसे प्यार।।

क्या थे और क्या हो गये,बना दिये कंगाल।
युवा स्वयं का खोजता,इसको जरा सम्भाल।।

बोलो कितना देश को, क्रिकेट दे रहा मान।
विकसित देशो में नहीं,क्यों इसकी पहचान।।
                
मानव से ज्यादा यहाँ,पानी पिये मशीन।
भूजल घटता जा रहा ,प्यासी यहाँ जमीन।।
   शालिनी शर्मा 

बारिष की बूंदों ने मुझको ये अहसास कराया है,
जैसे तन के लिए ये बादल गहने लेकर आया है,
प्यार लुटाती बूंदें ऐसे जैसे साजन गले मिले
बूंदों ने मोती बन कर तन मेरा खूब सजाया है।।
                  शालिनी शर्मा

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