दोहे शालिनी शर्मा के

शालिनी शर्मा की कविता




 राजनीति में अब कहीं ,मिलता न परमार्थ।
जो फ्री में कुछ दे रहा,उसका कुछ है स्वार्थ।।

 खुद बस जीना चाहते,सबको देगें  मार।
नयी नयी बीमारियां, प्रस्तावित उस पार।।

 अगर बचाना चाहता,इनसे अपनी जान।
नेताओं के जाल को,सखा जरा पहचान।।

हाथी के पैरों तले,हैं चींटी की जान।
फिर भी चींटी दे रही,हाथी को सम्मान।।

एक व्यवस्था का दिया,नाम जिसे सरकार।

आजादी पर आपकी,वो करती अधिकार।।

आँख खोल कर देखिए,कहाँ घिरे हो आप।
समझ रहे ये आपको,इस धरती का पाप।।

खुद बस जीना चाहते,सबको देगें  मार।
नयी नयी बीमारियां, प्रस्तावित उस पार।।

 जल,पावक, मिट्टी हवा,जीवन के आधार।
बिना एक भी चीज के,जीना है दुश्वार।।

 प्रेम, शान्ति,चैन की,नींद जरूरी मान।
भाग दौड़ को छोड़ दे,कर जीवन आसान

उन्हें बेचने हैं यहाँ,टीके बारम्बार।
उनके कहने पर हमें,लगवाती सरकार।।
                        शालिनी शर्मा 

कंगना जी से बोलिए,न दे गलत बयान।
किन्हें गटर ये कह रहीं,क्या इनको है ज्ञान।।
                    
ये जनरेशन जानती,इनके हित में कौन।
किसी जगह ये आपकी,जुबां न कर दे मौन।।

बन के सांसद रह रहीं,तुम सुविधा के साथ।
पर महनत के बाद भी,बच्चे खाली हाथ।।

बच्चों को बरबादियां,या लाठी की मार।
पीड़ाओं का ही उन्हे,मिलता बस उपहार।।

महनत का उनको कभी,मिला उचित न दाम।
बेकारी देगी भला,क्या अच्छा परिणाम।।

सांसद और विधायकों,मत भूलो ये बात।
इन्हीं गटर के वोट से,मिले जीत सौगात।।

आप सांसद बन गई,पाकर इनके वोट
गटर बताकर मार दी,इनके दिल पर चोट।।

इसी तरक्की का यहाँ,पीट रहे हो ढ़ोल।
जिसकी दिल्ली में खुली,इतनी तगड़ी पोल।।
                शालिनी शर्मा

 लाठी डण्डों से किया,ऐसे खत्म विरोध।
यहाँ न्याय की मांग का,मत करना अनुरोध।।

कौन इडियट हैं यहाँ,कौन चतुर,चालाक।
जिसकी लाठी,भैंस पर,वही जमाता धाक।।
               
नेताओं को चाहिए,गूंगी बहरी भीड़।
इनके पीछे जो चले,बनकर इनकी रीढ़।।

युवा पूछते फिर रहे,क्यों हैं वो बदहाल।
सब कुछ अच्छा है यहाँ,मत ऐसा भ्रम पाल।।

आजादी पर आपकी,लगा रहे हैं बैन।
ताकत से ये छीनते,कमजोरों का चैन।।
                
 तुम्हें मारने के लिए,जारी सभी प्रयास।
गिद्ध तुम्हारी गिन रहे,एक एक सब श्वास।।
                       शालिनी शर्मा

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