जन्मदिन


कौन समझता है यहाँ,बेटी तेरा त्याग।
तेरा अपना कुछ नहीं,तू बस एक चिराग 

बेटी की डोली सजी, चली सभी को छोड़।
दिल का टुकड़ा दे दिया, पिता खड़े कर जोड़।।

बेटी घर से जब गई, सूना हुआ मकान।
कोना-कोना ढूँढ़ता, बेटी की मुस्कान।।

बेटी सब कुछ छोड़कर,जाती है ससुराल।
अलग एक माहौल में,खुश रहती हर हाल।।

धान सरीखी जिंदगी,बेटी का किरदार।।
बीज कहाँ बोया गया,कौन फसल हकदार।।

गीतिका
राह में कांटे बिछा दे, देख फिर तू हौंसला,
तोड़ चाहें घर गिरा दे, देख फिर तू हौंसला ||

आंधियों से, बारिशों से डर नहीं लगता हमें,
खूब तूफां छत उड़ा दे, देख फिर तू हौंसला  

डूबती कश्ती किनारे पर लगानी सीख ली,
 छेद कश्ती में बना दे, देख फिर तू हौंसला ||

मंजिलों को ढूंढना है रोशनी चाहे न हो,
 राह के दीपक बुझा दे, देख फिर तू हौंसला ||

भूमि हो बंजर यदि, तो भी उगा देंगे तरू,
 बीज पर पहले लगा दे, देख फिर तू हौंसला
                      शालिनी शर्मा
                               


बेटी जब जब मांग में,भरती है सिन्दूर।
चाँद से मुखड़े पर नया,आ जाता है नूर।।





 

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