शालिनी शर्मा की कविता
कर दे देकर हो रहा,आम आदमी पस्त।
पूंजीपति,नेता,धनी, जीवन जीते मस्त।।
किस का पैसा बढ़ गया,निर्धन हुआ है कौन।
जनता के इस प्रश्न पर, सरकारें हैं मौन।।
मिडिल क्लास की जेब से,भरते अपने कोष।
दुगनी महनत का दिया,निर्धनता परितोष।।
खेल और कुछ चल रहा,दिखता है कुछ और।
चकाचौंध के जाल हैं,धुंधले भ्रम का दौर।।
मेरे हिस्से की फसल,कैसे दोगे काट।
चाकू लेकर वो खड़ा,किसकी देखे बाट।
वो मारे जबतक तुझे,तू शत्रु को काट।।
एक वर्ग के पैर को,वोट जीव मत चाट।
एक वर्ग को रेवड़ी,क्यों दूजे को
धरती तो सबकी यहाँ,कहाँ यहाँ मतभेद।
पर नेता सद्भाव में,कर देते हैं छेद।।
वर्तमान ही बस नहीं,किया भविष्य तबाह।
भावी समय में देखिए,क्या क्या होगा स्वाह।।
गर्दन पर तलवार है,कैसे जीना सीख।
खा महनत की रोटियां ,या फिर ले ले भीख।।
नेता की होती नहीं,डूब न दबकर मौत।
उसी तरह तू भी नहीं,असमय मृत्यु न्यौत।।
वर्तमान ही बस नहीं,किया भविष्य तबाह।
भावी समय में देखिए,क्या क्या होगा स्वाह।।
ब्रिटेन बेचने आ गया,सस्ती यहाँ शराब।
कम कीमत का ये नशा,करता नस्ल खराब।।
बना रहे वो मानसिक,अपना तुम्हें गुलाम।
छोटी कीमत दे रहे,दुगना लेते काम।।
अपने बच्चों का यहाँ,खुद ही रखिए ध्यान।
चहुं ओर बिखरे हुए, बर्बादी का ज्ञान।।
क्यों उनका हम भर रहे,रोज दनादन कोष।
जिनकी नीति में सदा,रहे हमेशा दोष।।



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