दोहे शालिनी शर्मा

शालिनी शर्मा की कविता






जन्तु सारे सोच में, नहीं सुरक्षित जान।
लालच ने अन्धा किया,ये निष्ठुर इन्सान।।

पशुओं पर संकट घिरा,छीन लिए आवास।
कहाँ घौंसले साथ ले,पंछी करें प्रवास।।

कटे वृक्ष को देख कर,पंछी करे पुकार।
मत हमको बेघर करो,सुन लो हाहाकार।।

जिसने हमको कर दिया,सुन बेघर, बर्बाद।
क्या पंछी,जंगल बिना,रहेगा वो आबाद।।

काट के जंगल कर रहा,अपना ही नुकसान।
पेड़ उगा के कर यहाँ, खुद पर ही अहसान।।
                      
घर के बीजों से भरो,धरती का उद्यान।
बीज बचेगें जब यहाँ,तभी बचेगी जान।

बेजुबान को दीजिए,जीने का अधिकार।
जान बचाने के लिए,खड़े मवेशी द्वार।।

पशुओं पर करता यहाँ,जो भी दवा प्रयोग।
अपने बच्चों का करे,पहले वो उपयोग।।

नेता ये बेकार हैं,इन पर करो प्रयोग।
नयी दवा की खोज में,इनका लो सहयोग।।

बेजुबान क्यों कर सहें, असहनीय ये पीर।
देखो इनकी आँख का,दुख से बहता नीर।।

बन्द क्रूरता कीजिए,दया कीजिए आप।
पशु आपको क्रोध में, कहीं न दे दे श्राप।।
                    शालिनी शर्मा

तू साजन जब साथ है,हर दिन है त्योहार।
दुनिया की हर चीज से,महँगा तेरा प्यार।।

दर्पण ने मुझसे कहा,खुद को जरा निहार।
काजल नयनों में लगा,अपनी नज़र उतार।।


                             शालिनी शर्मा 


सिस्टम के अन्याय से,कितने हुए तबाह।
बहरे कानों ने नहीं,सुनी किसी की आह।।
               शालिनी शर्मा

चन्दा उतरा झील में,लहर निखारे रूप।
चमक रही है चाँदनी,बन के शब की धूप।।

Comments